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चोरी से मुक्ति हिंदी पौराणिक कहानी - Pauranik Kathayen in hindi

आज हम आपको amazingdarbar.com में हिंदी पौराणिक कथा  Pauranik Kathayen in hindi बताने  जा रहे हैं। 

एक समय  कांचीपुर नामक ग्राम  में  वज्र नाम का एक चोर रहता था। चोर नाम के भांति ही वज्र ह्रदय का था। उसे जिसका जो मिलता चुरा लेता। उसे तनिक भी दया नहीं आती थी की उस सामान के स्वामी को कितना कष्ट होगा। वह चुराए हुए धन को राज्य  सिपाहियों के भय से जंगल में जमीन के अंदर छुपा देता था                               एक रात विरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली। और चोर के जाने के पश्चात जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया. और गड्ढे को पहले की भांति धक दिया। लकड़हारा इतनी चालाकी से सामान निकलता की चोर को इस चोरी का पता नहीं चल पता था।  एक  दिन लकड़हारा अपनी धन देते हुए बोला तुम रोज धन माँगा करती थी लो आज प्रयप्त धन प्राप्त होगया है।  उसकी पत्नी ने कहा जो धन अपने परिश्रम से उपार्जित न किया गया हो वह स्थाई  नहीं होता है। इसलिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिये। विरदत्त को भी ये बात जच गयी। 


इसलिए उसने इस  धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया। जिसका पानी कभी भी नहीं  सूखता था। इसमें सीढ़िया लगनी रह गयी थी। और सरे पैसे समाप्त होगये थे। तो वह छिपकर फिर चोर का अनुसरण करने लगा की वह धन कहा कहा छुपाता है। इसके बाद फिर उससे दसवां हिस्सा निकाल के तालाब का काम पूरा करवाया। उसने भगवान शंकर  और भगवन  विष्णु के भव्य मंदिर बनवाए। जंगल कटवा के खेत बनाये और ब्राह्मणो में वितरित कर दिया। ब्राम्हणो ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसका नाम द्विजवर्मा रखा ।

              जब द्विजवर्मा की मृत्यु हुई तब एक ओर से यमदूत आये और एकओर भगवन शंकर और विष्णु जी के दूत आये। उनमे आपस में विवाद होने लगा  इसी बीच वहां नारद जी पधारे। और उन्होंने ने उनको समझाया 'आप विवाद न करें इस लकड़हारे ने चोरी के धन से मंदिर आदि का निर्माण कराया। अतः जबतक कुमार्ग से अर्जित धन का प्राश्चित नहीं कर लेता तब तक वायु रूप में अंतरिक्ष में विचरण करता रहे। नारद जी की बात सुनकर सभी दूत वापस लौट गए। द्विजवर्मा बारह वर्षों तक प्रेत बनकर घूमता रहा।
               
                   नारद जी ने लकड़हारे  की पत्नी से कहा तुम ने अपने पति को सदमार्ग दिखाया इसलिए तुम ब्रम्ह्लोक जाओ।  लेकिन  लकड़हारे की पत्नी  अपने पति के दुःख से दुखी थी। वह देवर्षि से बोली -'जब तक मेरे पति को देह नहीं मिलती तबतक मैं यही रहूंगी। जो\गति मेरे पति की हुई वही गति मैं भी चाहती हूँ। '

ये बातें सुनकर देवर्षि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बताया की तुम अपने पति की मुक्ति के लिए शिव की आराधना करो।
उसने अपने पति के लिए शिव की आराधना लगन से की। इससे उसके पति के चोरी का सारा पाप धूल गया। फिर दोनों पति पत्नी को उत्तम लोक मिला। वज्र चोर तथा कांची के सभी धनी जिनका धन इस कार्य में लगा था सपरिवार स्वर्ग चले गए.

                                     
                                                                                                                    कथा  स्रोत ब्रम्हपुराण - 

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