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राजा परीक्षित् hindu mythology stories





सुभद्राकुमार अभिमन्यु की पत्नी महाराज विराट की पुत्री उत्तरा गर्भवती थीं ।उनके उदर में कौरव एवं पाण्डवों का एक मात्र वंशधर था ।अश्वत्थामा ने उस बालक का विनाश करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया ।भयविह्वल उत्तरा भगवान श्री कृष्ण की शरण में गयी।भगवान ने उसे अभयदान दिया और बालक की रक्षा के लिए वे सूक्ष्मरूप से उत्तरा के गर्भ में स्वयं पहुँच गये ।गर्भस्थ शिशु ने देखा कि एक प्रचण्ड तेज चारों ओर से समुद्र की भाँति उमड़ता हुआ उसे भस्म करने आ रहा है ।

















इसी समय बालक ने अँगूठे के बराबर ज्योतिर्मय भगवान को अपने पास देखा ।भगवान अपने कमल नेत्रों से बालक को स्नेहपूर्वक देख रहे थे ।उनके सुंदर श्याम वर्ण पर पीताम्बर की अद्भुत शोभा थी।उनकी चार भुजाएँ थीं और उनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म थे।अपनी गदा को उल्का के समान चारों ओर शीघ्रता से घुमाकर भगवान उस उमड़ते आते अस्त्र-तेज को बराबर नष्ट करते जा रहे थे ।बालक दस महीने तक भगवान को देखता रहा ।वह सोचता ही रहा -- ये कौन हैं? जन्म का समय आने पर भगवान वहाँ से अदृश्य हो गये ।बालक मृत सा उत्पन्न हुआ; क्योंकि जन्म के समय उस पर ब्रह्मास्त्र का प्रभाव पड़ गया था ।तुरंत श्री कृष्ण प्रसूतिकागृह में आये और उन्होंने उस शिशु को जीवित कर दिया ।यही बालक परीक्षित् नाम से विख्यात हुआ ।
जब परीक्षित् बड़े हुए, पाण्डवों ने इन्हें राज्य सौंप दिया और स्वयं हिमालय पर चले गये ।परीक्षित् ने राज्य में सुव्यवस्था स्थापित की।
एक दिन आखेट करते हुए परीक्षित् वन में भटक गये ।भूख और प्यास से व्याकुल वे एक ऋषि के आश्रम में पहुँचे।ऋषि उस समय ध्यानस्थ थे।राजा ने उनसे जल माँगा, पुकारा; परंतु ऋषि को कुछ पता नहीं लगा।राजा को लगा कि मुनि जान बूझकर मेरा अपमान कर रहे हैं ।पास में ही एक मरा सर्प पड़ा था ।उन्होंने उसे धनुष से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया, फिर वे राजधानी लौट गये।बालकों के साथ खेलते हुए उन ऋषि के तेजस्वी पुत्र ने जब यह समाचार सुना, तब शाप दे दिया --' इस दुष्ट राजा को आज के सातवें दिन तक्षक काट लेगा।'
उस समय परीक्षित् भीमसेन द्वारा विजित मगधराज जरासंध का स्वर्णमुकुट सिर पर धारण किए थे ।उसमें कलि का वास हो गया था, इसीलिए उनसे यह अकरणीय कृत्य हो गया ।घर पहुँच कर मुकुट उतारने पर परीक्षित् को स्मरण आया कि 'मुझसे आज बहुत बड़ा अपराध हो गया '।वे पश्चाताप कर ही रहे थे, इतने में शाप की बात का उन्हें पता लगा।इससे राजा को तनिक भी दुख नहीं हुआ ।अपने पुत्र जनमेजय को राज्य देकर वे गंगा तट पर जा बैठे ।सात दिनों तक उन्होंने निर्जल व्रत का निश्चय किया ।उनके पास उस समय बहुत से ऋषि मुनि आये।परीक्षित् ने कहा -- ऋषिगण ! मुझे शाप मिला, यह तो मुझ पर भगवान की कृपा ही हुई।मैं विषयभोगों में आसक्त हो रहा था, दयामय भगवान ने शाप के बहाने मुझे उनसे अलग कर दिया ।अब आप मुझे भगवान का पावन चरित सुनाइये।
उसी समय वहाँ घूमते हुए श्री शुकदेव जी पहुँच गये ।परीक्षित् ने उनका पूजन किया।उनके पूछने पर शुकदेव जी ने सात दिनों में उन्हें पूरे श्रीमद्भागवत् का उपदेश किया ।अन्त में परीक्षित् ने अपना चित्त भगवान में लगा दिया ।तक्षक ने आकर उन्हें काटा और उसके विष से उनकी देह भस्म हो गयी, पर वे तो पहले से ही शरीर से ऊपर उठ चुके थे ।उनको इस सबका पता तक नहीं चला ।